चुनाव आयोग ने बिहार में एसआईआर के दौरान मतदाता सूची से जो नाम हटाए हैं, उसको लेकर अब गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। क्या ऐसा हो सकता है कि किसी एक बूथ से डिलीट किए गए सभी मतदाताओं के नाम को हटाने का कारण मौतें हो? ऐसा कोई सिर्फ़ एक बूथ पर नहीं, बल्कि क़रीब एक हज़ार बूथों पर ऐसा ही हुआ हो तो? बड़ी संख्या में बूथों पर हटाए गए मतदाताओं में युवा मौतों का असामान्य अनुपात क्या दिखाता है? सवा सौ बूथों पर हटाए गए मतदाताओं में 80 फीसदी से ज़्यादा महिलाएँ क्यों हैं?
दरअसल, चुनाव आयोग ने एसआईआर के दौरान ड्राफ़्ट मतदाता सूची में 65 लाख लोगों के जो नाम हटाए हैं उसके डेटा के विश्लेषण के बाद मतदाताओं के नाम डिलीट किए जाने में अजीबोगरीब पैटर्न दिखे हैं। द हिंदू ने इन डेटा का विश्लेषण किया है और कहा है कि कम से कम आठ श्रेणियों में ये पैटर्न दिखे।
चुनाव आयोग यानी ईसीआई ने मतदाताओं के नाम हटाने के लिए तीन वजहें बताई हैं। मतदाताओं की मौत हो जाना, मतदाताओं का दूसरी जगह शिफ़्ट हो जाना और मतदाताओं का दो या इससे ज़्यादा जगहों पर सूची में नाम होना। इन्हीं तीन आधार पर बिहार की मतदाता सूची से 65 लाख से अधिक नामों को हटाया गया। द हिंदू ने विधानसभा भाग यानी बूथ-वार विश्लेषण कर अजीबोगरीब पैटर्न को उजागर किया है। यह अजीगरीब पैटर्न इसलिए कि ये पैटर्न सांख्यिकीय रूप से असंभव से लगते हैं।
द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार विश्लेषण में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने में ये पैटर्न देखे हैं-
80 भागों यानी बूथों में युवा मौतों का असामान्य अनुपात ।973 बूथों में सभी नाम हटाए जाने की वजह केवल मौतें। 412 बूथों में बहुत ज़्यादा मौत की रिपोर्टें। 7216 बूथों में मौत अनुपात ज़्यादा।127 बूथों में महिलाओं के नाम ज़्यादा हटाए गए। 1985 बूथों में असामान्य रूप से ज़्यादा मतदाता हटाए गए। 5084 बूथों में बड़े पैमाने पर ‘अनुपस्थित’ वजह बताई गई। 663 बूथों में ‘स्थायी रूप से स्थानांतरित’ महिलाओं का पैटर्न दिखा।
अंग्रेज़ी अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार वे बूथ जहाँ 50 से ज़्यादा लोगों की मौत दर्ज की गई, उनमें कम से कम आधे 50 साल से कम उम्र के थे। डेटा से बिहार के 80 भागों यानी मतदान केंद्रों का पता चलता है जहाँ मौत का पैटर्न जनसांख्यिकीय मानदंडों से अलग है। सामान्य आबादी में मौतें ज़्यादातर बुज़ुर्ग लोगों में होती हैं, इसलिए कम उम्र के लोगों की मौत का ज़्यादा प्रतिशत सांख्यिकीय रूप से असामान्य है।
वैसे मतदान केंद्र जहाँ कम से कम 50 महिलाओं के नाम काटे गए, वहाँ सभी हटाए गए नामों में से 80% या उससे ज़्यादा महिलाएँ थीं। यह एक चिंताजनक असमानता है। 127 बूथों में ऐसा लिंग भेदभाव ज़्यादा है।
अंग्रेज़ी अख़बार ने लिखा है कि यह पैटर्न महिला मतदाताओं को वोट देने के अधिकार से वंचित करने की संभावना दिखाता है, खासकर उन क्षेत्रों में जहाँ अल्पसंख्यक आबादी ज़्यादा है। बूथों में 200 से ज़्यादा नाम काटे गए जो सामान्य दर से कहीं ज़्यादा है। 1985 बूथों में यह असमानता देखी गई, जो मतदाताओं के नाम हटाने का बहुत बड़ा आंकड़ा है।
क़रीब 412 मतदान केंद्रों में से हर में 100 से ज़्यादा मौतें दर्ज की गईं। 7216 मतदान केंद्रों में 75% से ज़्यादा नाम हटाने का कारण मौत बताया गया। मौत के कारण नाम हटाने का आंकड़ा सामान्य जनसांख्यिकीय पैटर्न से कहीं ज़्यादा है। क़रीब 973 मतदान केंद्रों में सभी नाम सिर्फ़ मौत के कारण हटाए गए, कोई दूसरा कारण नहीं। यह सांख्यिकीय रूप से असंभव स्थिति है कि हर नाम सिर्फ़ मौत के कारण हटाया गया।
पूर्णिया, किशनगंज और चंपारण जैसे अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं के पास के जिलों में असमानताएँ ज़्यादा हैं। गोपालगंज विधानसभा क्षेत्र में भी ऐसी असमानताएँ ज़्यादा हैं। कई प्रभावित क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ मुस्लिम आबादी ज़्यादा है।
ऐसे में सवाल उठता है कि मतदाताओं को मृत बताने से पहले क्या सत्यापन किया गया था? कुछ क्षेत्रों में इतनी ज़्यादा असमानताएँ क्यों हैं? महिलाओं को ज़्यादा क्यों हटाया गया? और कई क्षेत्रों में इतने ज़्यादा युवा मतदाताओं को ‘मृत’ श्रेणी में क्यों रखा गया?
दरअसल चुनाव आयोग की अंतिम मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। नए मतदाताओं की संख्या में गड़बड़ी और नामों की बड़ी मात्रा में कटौती पर पारदर्शिता की कमी की बात सामने आ रही है। राज्य में करीब 68.5 लाख नामों की कटौती हाशिए पर मौजूद समुदायों का बड़े पैमाने पर मताधिकार छीनने की कोशिश बताई जा रही है।
सूची का विश्लेषण बता रहा है कि नेपाल और बांग्लादेश से सटे कई जिलों में मतदाताओं संख्या बेहद कम हो गई है। सबसे अधिक कमी मधुबनी में दर्ज की गई, जहां 266,900 नाम हटाए गए, इसके बाद पूर्णिया में 190,858 और सीतामढ़ी में 177,474 नाम हटाए गए। अन्य उल्लेखनीय जिलों में सुपौल (103,675), किशनगंज (104,488) और पूर्वी चंपारण (7,834) हैं। ये सभी जिले मुस्लिम बहुल हैं। इन इलाकों को लेकर भाजपा और उसके सहयोगी दल घुसपैठियों की मौजूदगी का आरोप लगाते रहे हैं। ड्राफ्ट मतदाता सूची में भी इन्हीं जिलों के मतदाताओं के नाम विभिन्न आधार पर साफ हो गए थे।
सीमावर्ती क्षेत्रों में मतदाता संख्या में इस तेज गिरावट ने राजनीतिक बहस को फिर से शुरू कर दिया है, जिसमें यह अनुमान लगाया जा रहा है कि क्या ये हटाए गए नाम पहले किए गए “घुसपैठियों” को मतदाता सूची में शामिल करने के दावों से संबंधित हैं। जहां भाजपा इस मुद्दे को लगातार उठा रही है, वहीं कांग्रेस सहित विपक्षी दलों ने निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया पर असंतोष जताया है।
एक्टिविस्ट और चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव ने फाइनल मतदाता सूची को लेकर तमाम सवाल उठाए हैं। योगेंद्र यादव ने एक्स पर लिखा- “चुनाव आयोग के अनुसार 1 सितंबर तक 16.93 लाख फॉर्म-6 आवेदन नए मतदाताओं के लिए प्राप्त हुए थे। इस तिथि के बाद के आवेदन अंतिम सूची में शामिल नहीं होने थे। लेकिन डेटा बताता है कि 21.53 लाख नए मतदाता जुड़ गए। आखिर 1 सितंबर के बाद कम से कम 4.6 लाख नाम कैसे जोड़े गए?”
उन्होंने मतदाताओं की कटौती की अस्पष्टता पर भी सवाल उठाए। यादव ने कहा, “चुनाव आयोग के मुताबिक ड्राफ्ट सूची से 3.66 लाख नाम हटाए गए, लेकिन इसकी कोई विस्तृत जानकारी नहीं दी गई। कितने नाम दस्तावेजों की कमी के कारण हटाए गए और कितने आपत्तियों के आधार पर, यह अब तक स्पष्ट नहीं है।”
जून में अचानक घोषित इस एसआईआर की समयसीमा को बिहार की विविधता और बड़ी प्रवासी आबादी को देखते हुए अव्यावहारिक बताया गया था। घर-घर सत्यापन अभियान के दौरान बड़ी संख्या में परिवार छूट गए। वहीं कड़ी दस्तावेजी शर्तों के कारण गरीब और हाशिए के समुदायों के कई लोग सूची से बाहर हो गए। स्थिति यह है कि 2001 से 2005 के बीच जन्मे सिर्फ 2.8% बिहार के युवाओं के पास ही जन्म प्रमाणपत्र है, जिससे समस्या और गंभीर हो गई है।